Thursday, 28 January 2010

धुआं धुआं करके ...

धुआं धुआं करके जल रहे है
और उसी में घुट रहा हूँ.
कल जहाँ पर बगीचा था और
आज वही शमशान है.
अपने खवाबों को सींच रह था जहाँ
उन्ही का अंतिम संस्कार कर रहा हूँ.
आब-इ-दीदः ना दिख जाये आज
इसीलिए कविता में डूब के रो रहा हूँ