Friday, 7 August 2009

क्या पाया क्या खोया

जिंदगी कि आपा धापी में कभी कभी ये सोचता हूँ
क्या पाया क्या खोया
कभी चाँद को छूने कि ख्वाहिश
कभी गहरे सागर में तेरने की
किसी को पाने कि ख्वाहिश
तो किसी से दूर जाने की
कुछ इन्ही ख्वाहिशों में हम सपने बुन लेते है
इन्ही सपनों के लिए कुछ रास्तों पे चल लेते है
कुछ लोग साथ चल पड़ते है
कुछ पीछे रह जाते है
कारवां यूहि बनता जाता है.
मंजिले पास आती जाती है
जाने कितनी ठोकर खायी है
कितने अपनों को खोया है
जब अहसास होता है तब तक जाने कहा वो
आँखों से ओझल हो जाते है
जब भी खाली बैठता हों तो यही सोचता हों
जिंदगी कि आपा धापी में
क्या पाया क्या खोया