Monday, 23 July 2012

आज फिर से कल याद आ गया

आज फिर से कल याद आ गया
जिन्हें छोड़ आया था में कही
वो फिर से मेरे सामने आ गया

भुला दी थी वो बाते
मिटा दी थी वो यादें
वही चेहरा फिर सामने आ गया

आज फिर से कल याद आ गया..

Thursday, 28 January 2010

धुआं धुआं करके ...

धुआं धुआं करके जल रहे है
और उसी में घुट रहा हूँ.
कल जहाँ पर बगीचा था और
आज वही शमशान है.
अपने खवाबों को सींच रह था जहाँ
उन्ही का अंतिम संस्कार कर रहा हूँ.
आब-इ-दीदः ना दिख जाये आज
इसीलिए कविता में डूब के रो रहा हूँ

Friday, 7 August 2009

क्या पाया क्या खोया

जिंदगी कि आपा धापी में कभी कभी ये सोचता हूँ
क्या पाया क्या खोया
कभी चाँद को छूने कि ख्वाहिश
कभी गहरे सागर में तेरने की
किसी को पाने कि ख्वाहिश
तो किसी से दूर जाने की
कुछ इन्ही ख्वाहिशों में हम सपने बुन लेते है
इन्ही सपनों के लिए कुछ रास्तों पे चल लेते है
कुछ लोग साथ चल पड़ते है
कुछ पीछे रह जाते है
कारवां यूहि बनता जाता है.
मंजिले पास आती जाती है
जाने कितनी ठोकर खायी है
कितने अपनों को खोया है
जब अहसास होता है तब तक जाने कहा वो
आँखों से ओझल हो जाते है
जब भी खाली बैठता हों तो यही सोचता हों
जिंदगी कि आपा धापी में
क्या पाया क्या खोया